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भारतीय लोकतंत्र समस्याएं और समाधान

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भारतीय संविधान में अब तक 124 संशोधन हो चुके हैं। इनमें से कुछ संशोधन ऐसे भी थे जिन्होंने संविधान का चरित्र ही बदल दिया। मुझे यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि इनमें से बहुत से संशोधन ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने लोकतंत्र की सार्थकता खत्म कर दी, संविधान की सार्थकता भी खत्म कर दी और खुद संविधान पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया।
भारतवर्ष में प्रतिभा की कमी नहीं है, कभी रही भी नहीं। बहुत से भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुखिया बनकर नाम कमा रहे हैं। सबीर भाटिया ने हॉटमेल का आविष्कार किया, इंद्रा नूई पेप्सिको जैसी शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कंपनी की मुखिया रहीं तो सुंदर पिचाई गूगल के मुखिया के रूप में नाम कमा रहे हैं। यह सूची बहुत लंबी है। इसी तरह हमारे देश में अत्यधिक प्रतिभाशाली वकीलों और संविधान विशेषज्ञों ने भी नाम कमाया है। परंतु मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि जब संविधान से लगातार बलात्कार हो रहा था तो यह परिवर्तन संविधान के इन विशेषज्ञों की नज़र में क्यों नहीं आये, उनमें से किसी ने भी इन संशोधनों के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाई? भारतीय लोकतंत्र में जैसे ही सरकारों के कामकाज की समीक्षा करते हुए गहराई में जाते हैं तो हमारे सामने एक यक्ष प्रश्न यही रह जाता है कि हम स्वयं को लोकतंत्र किस आधार पर कहते हैं? अंग्रेज़ी में जिस थोथे और दिखावे के लोकतंत्र को “बनाना रिपब्लिक” कहा जाता है वह विशेषण भारतीय लोकतंत्र पर पूरी तरह से लागू होता है।
हमारे देश के विपक्षी दलों में भी ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल नहीं है जो संविधान के इन संशोधनों पर बेबाकी से बात कर सकते हों, उसके बावजूद यह एक पहेली ही है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर कोई सार्थक चर्चा सिरे से ही नदारद है। राम जेठमलानी, फली नारीमन जैसे नामी-गिरामी वकील और संविधान विशेषज्ञ चुप्पी में ही भगवान को प्यारे हो गये। शांति भूषण, प्रशांत भूषण और सुब्रहमण्यन स्वामी आदि तो कुछ ही और ऐसे नाम हैं जिनकी चुप्पी मेरे लिए बड़ा रहस्य है।
इस पुस्तक के माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ी विचारधारा का समर्थन या विरोध करना मेरा उद्देश्य नहीं है। किसी एक दल या राजनेता के बारे में बात करना मेरा मंतव्य नहीं है। बस हमें यह सोचना है कि लोकतंत्र में हमारे नेताओं की भूमिका क्या हो? इतिहास साक्षी है कि एक प्रधानमंत्री ने देश पर आपात्काल थोप दिया, एक अन्य प्रधानमंत्री ने देश को मंडल कमीशन द्वारा सुझाए गए आरक्षण की आग में झोंक दिया, एक दूसरे प्रधानमंत्री ने योजना आयोग जैसी एक महत्वपूर्ण संस्था को खत्म कर दिया, नोटबंदी लागू कर दी। यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या किसी एक व्यक्ति या गुट,चाहे वह कोई भी क्यों न हो, के पास इतनी शक्ति दी जानी चाहिए कि वह देश को किसी भी दिशा में हांक सके?

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